एक सुंदर से गाँव में समीर नाम का एक किसान रहता था। उसके पास बहुत सारी ज़मीन और अनाज के ढेर थे। समीर बहुत अमीर था, लेकिन उसमें एक कमी थी। जब भी कोई मेहमान या राहगीर उसके घर आता, वह उन्हें खाना देने में कतराता था। वह सोचता था, 'यह मेरी मेहनत की कमाई है, मैं इसे दूसरों पर क्यों खर्च करूँ?'
एक बार, तेज़ बारिश के दौरान एक बूढ़ा व्यक्ति समीर के दरवाज़े पर आया। वह बहुत भूखा और थका हुआ था। समीर की पत्नी, मीरा, ने उसे अंदर बुलाकर खाना खिलाने की कोशिश की, लेकिन समीर ने उसे रोक दिया। उसने कहा, 'हम इस अजनबी को खाना क्यों दें?'
समय बीतता गया, समीर और अमीर होता गया, लेकिन उसका दिल छोटा होता गया। एक दिन, एक प्यासा बच्चा पानी माँगने आया, तो समीर ने उसे झिड़क कर भगा दिया। उस बच्चे के जाने के बाद, समीर को अपने अनाज के बड़े-बड़े भंडारों के बीच भी एक अजीब सी खालीपन और गरीबी महसूस हुई। उसे समझ आया कि बिना दया और अतिथि सत्कार के, सारा धन व्यर्थ है। उसके पास सब कुछ था, फिर भी वह भीतर से गरीब था।