एक छोटे से गाँव में राम और सीता नाम का एक जोड़ा रहता था। एक शाम, सोमनाथ नाम के एक बुजुर्ग यात्री उनके घर आए। वे बहुत थके हुए लग रहे थे।
सीता ने तुरंत मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया। राम ने उन्हें पानी पिलाया। लेकिन कुछ देर बाद, राम अपने काम में व्यस्त हो गया और सीता रसोई के कामों में लग गई। उन्होंने सोमनाथ जी को खाना तो परोसा, लेकिन वे उनसे बात नहीं कर रहे थे। वे बार-बार अपना चेहरा दूसरी ओर मोड़ लेते थे, जैसे वे किसी काम में बहुत जल्दी में हों।
सोमनाथ जी को बहुत अकेलापन महसूस हुआ। उन्होंने सोचा, 'इन्होंने मुझे भोजन तो दिया, लेकिन इनके चेहरे देखकर लग रहा है कि मैं इनके लिए बोझ हूँ।' उन्हें बहुत बुरा लगा और वे चुपचाप वहाँ से जाने के लिए तैयार होने लगे।
सीता ने उनकी उदासी देख ली और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। 'ओह! हमने उन्हें खाना तो दिया, लेकिन प्यार और सम्मान देना भूल गए!' उसने सोचा। वह दौड़कर सोमनाथ जी के पास गई और उनके हाथ पकड़कर बोली, 'बाबा, हमें क्षमा कर दीजिए। हम अपने काम में इतने खो गए थे कि आपका ध्यान नहीं रख पाए। हमें आपको यहाँ पाकर बहुत खुशी हुई है।' राम भी दौड़कर आया और विनम्रता से माफी मांगी।
उनका सच्चा पछतावा देखकर सोमनाथ जी का मन खुश हो गया। वे फिर से बैठ गए और खुशी-खुशी भोजन किया। राम और सीता ने सीखा कि मेहमान नवाजी का मतलब सिर्फ खाना खिलाना नहीं, बल्कि मुस्कुराहट के साथ स्वागत करना है।