एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके दादाजी माधव रहते थे। अर्जुन का परिवार खेती करता था, लेकिन एक साल भीषण सूखे के कारण उनकी सारी फसलें बर्बाद हो गईं। परिवार बहुत मुश्किल में था। यह देखकर पास के शहर के एक दयालु व्यक्ति, मिस्टर सैमुअल ने उनकी मदद के लिए अनाज और कुछ पैसे दिए।
कई साल बीत गए। अर्जुन बड़ा होकर एक बहुत ही कुशल और नेक डॉक्टर बना। एक दिन उसे पता चला कि अब बुजुर्ग हो चुके मिस्टर सैमुअल बहुत बीमार हैं। कई डॉक्टरों ने इलाज किया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हो रहा था। अर्जुन तुरंत वहां पहुँचा और अपनी पूरी मेहनत और कुशलता से दिन-रात सेवा करके मिस्टर सैमुअल को ठीक कर दिया।
जब मिस्टर सैमुअल ठीक हुए, तो अर्जुन ने भावुक होकर कहा, "सर, सालों पहले आपने जो छोटी सी मदद की थी, उसी की वजह से आज मैं इस काबिल बन पाया हूँ।" मिस्टर सैमुअल मुस्कुराए और बोले, "अर्जुन, मेरी मदद तो बहुत छोटी थी, लेकिन तुमने जिस तरह से खुद को एक महान इंसान बनाया है, उसने उस मदद की कीमत बहुत बढ़ा दी है। मदद की कीमत इस बात में नहीं है कि उसने कितना दिया, बल्कि इस बात में है कि उसे पाने वाला व्यक्ति कितना महान है।" गाँव के सभी लोगों ने समझा कि मदद की असली महानता देने वाले में नहीं, बल्कि लेने वाले के चरित्र में होती है।