एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसके पिता, श्री राघव, गाँव के सरपंच थे और अपनी निष्पक्षता के लिए जाने जाते थे। एक दिन, रोहन और रवि नाम के दो लड़कों के बीच एक सुंदर लकड़ी के खिलौने को लेकर झगड़ा हो गया। रोहन, राघव जी के एक करीबी दोस्त का बेटा था, जबकि रवि एक साधारण मजदूर का बेटा था।
दोनों लड़के राघव जी के सामने अपनी बात रखने आए। रोहन ने बहुत ही मीठे और प्रभावशाली शब्दों में अपनी बात कही कि खिलौना उसका है। दूसरी ओर, रवि थोड़ा घबराया हुआ था और उसने बस इतना कहा, "यह मुझे पेड़ के पास मिला था।"
एक पल के लिए राघव जी के मन में द्वंद्व चला। रोहन की मधुर वाणी और अपने मित्र के प्रति लगाव के कारण उनका मन रोहन का साथ देने को हुआ। लेकिन उन्होंने तुरंत अपने मन को संभाला। उन्होंने केवल शब्दों की मिठास नहीं देखी, बल्कि सच्चाई को परखा।
राघव जी ने शांति से कहा, "रोहन, तुम्हारे शब्द बहुत सुंदर हैं, लेकिन मीठे शब्द सच को नहीं बदल सकते। यह खिलौना रवि का है।"
अर्जुन ने अपने पिता को देखते हुए कहा, "पिताजी, आप रोहन की मीठी बातों में नहीं आए।"
राघव जी मुस्कुराए और बोले, "जब मन में किसी के प्रति झुकाव या पक्षपात नहीं होता, तभी हमारी वाणी में सच्चा न्याय होता है।"