एक छोटे से गाँव में कवंची नाम की एक लड़की रहती थी। उसे मिठाइयाँ बहुत पसंद थीं। एक दिन उसके पिता, माधव, गाँव के उत्सव की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने एक थाली में स्वादिष्ट मिठाइयाँ रखीं और कवंची से कहा, "कवंची, शाम तक इन मिठाइयों को हाथ मत लगाना। अगर तुमने खुद पर काबू रखा, तो मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा उपहार दूँगागा।"
कवंची ने कोशिश तो की, लेकिन मिठाइयों की खुशबू उसे ललचा रही थी। उसके मन ने कहा, "बस एक टुकड़ा चखने से क्या होगा? किसी को पता नहीं चलेगा।" वह खुद को रोक नहीं पाई और उसने लगभग सारी मिठाइयाँ खा लीं। जब उसके पिता आए, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा, "कवंची, क्योंकि तुम अपनी इच्छा पर काबू नहीं रख पाई, इसलिए मैं तुम्हें वह उपहार नहीं दे सकता जो मैंने तुम्हारे लिए सोचा था।"
कवंची को अपनी गलती का अहसास हुआ। कुछ दिनों बाद, एक और परीक्षा आई। खेलते समय उसके दोस्त अर्जुन ने गलती से उसका पसंदीदा खिलौना तोड़ दिया। कवंची को बहुत गुस्सा आया। वह चिल्लाना चाहती थी, लेकिन तभी उसे अपनी पुरानी गलती याद आई। उसने गहरी साँस ली और खुद को शांत रखा। उसकी इस समझदारी को देखकर उसके माता-पिता बहुत खुश हुए और उसे इनाम में एक सुंदर कहानी की किताब दी। कवंची समझ गई कि आत्म-संयम ही असली ताकत है।