थिरुविही नामक एक सुंदर गाँव में करिकालन नाम का एक कुशल मूर्तिकार रहता था। उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत होती थीं कि लोग उन्हें देखने दूर-दूर से आते थे। करिकालन न केवल एक कलाकार था, बल्कि एक बहुत ही दयालु इंसान भी था जो हमेशा गरीबों की मदद करता था। एक दिन, गाँव के उत्सव के लिए एक बड़ी मूर्ति बनाते समय, उसका मित्र सोमू उससे मिलने आया। सोमू अपने काम में कुछ परेशानियों का सामना कर रहा था। तभी करिकालन ने बिना सोचे-समझे कह दिया, 'सोमू, तुम ये सब क्यों करते हो? तुम तो कोई भी काम ठीक से नहीं कर सकते!'
उस एक शब्द ने सोमू के दिल को छलनी कर दिया। वह रोता हुआ वहाँ से चला गया। उस दिन के बाद से सोमू ने करिकालन से बात करना बंद कर दिया। करिकालन ने समाज के लिए बहुत से अच्छे काम किए थे, लेकिन उस एक कड़वे शब्द ने उसकी सारी अच्छाई पर ग्रहण लगा दिया। लोग कहने लगे, 'वह कलाकार तो अच्छा है, पर उसकी वाणी बहुत कड़वी है।' करिकालन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सोमू से जाकर माफी मांगी और सीखा कि अपनी वाणी पर संयम रखना ही असली गुण है।