एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही सीधा और सरल था। लेकिन उसका पड़ोसी रोहन अक्सर उसे परेशान करता और उसका मज़ाक उड़ाता था।
एक दोपहर, अर्जुन नदी के किनारे रेत का एक सुंदर महल बना रहा था। जैसे ही उसने महल पूरा किया, रोहन दौड़कर आया और उसे लात मारकर तोड़ दिया। 'यह क्या बेकार चीज़ बनाई है!' रोहन हँसते हुए बोला।
अर्जुन को बहुत गुस्सा आया। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने रोहन को कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप फिर से रेत का महल बनाने लगा। यह देखकर उसके दादाजी उसके पास आए और पूछा, 'अर्जुन, तुमने उसे जवाब क्यों नहीं दिया?'
अर्जुन ने उदास होकर कहा, 'दादाजी, उसने मेरा महल तोड़ दिया और मेरा मज़ाक उड़ाया।'
दादाजी ने मुस्कुराते हुए ज़मीन की ओर इशारा किया और कहा, 'बेटा, इस धरती को देखो। जब लोग इसमें गड्ढे खोदते हैं, तो क्या धरती उनसे गुस्सा होती है? नहीं, धरती सबको सहती है और सबको सहारा देती है। ठीक वैसे ही, जो लोग हमें बुरा कहते हैं, हमें उन्हें धैर्य के साथ सहना चाहिए। यही असली महानता है।'
अर्जुन को दादाजी की बात समझ आ गई। अगली बार जब रोहन ने उसे चिढ़ाने की कोशिश की, तो अर्जुन ने गुस्सा करने के बजाय बस मुस्कुरा दिया। अर्जुन की इस शांति को देखकर रोहन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने अर्जुन से माफ़ी माँगी और दोनों अच्छे दोस्त बन गए।