एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक किसान रहता था। उसके पास खाने के लिए बहुत कम अनाज था। एक बरसात की शाम, एक थका हुआ मुसाफिर उसके दरवाजे पर आया। माधव की पत्नी राधा ने घबराते हुए कहा, 'माधव, हमारे पास तो खुद के लिए भी बहुत कम है, अगर हमने इसे दे दिया तो हम क्या खाएंगे?' माधव ने शांति से कहा, 'मेहमान को मना करना सबसे बड़ी गरीबी है।' उन्होंने खुशी-खुशी अपना भोजन मुसाफिर के साथ बाँट लिया।
अगले दिन सुबह, गाँव का एक गुस्सैल व्यक्ति, विक्रम, माधव के घर आया और बिना वजह चिल्लाने लगा। वह बहुत ही अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा था। राधा को बहुत गुस्सा आया, लेकिन माधव बिल्कुल शांत रहा। उसने विक्रम की कड़वी बातों का जवाब गुस्से से नहीं दिया।
माधव के इस धैर्य को देखकर विक्रम को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह शर्मिंदा हो गया। उसने पूछा, 'तुम इतने शांत कैसे रह सकते हो?' माधव ने मुस्कुराकर कहा, 'असली ताकत पलटकर लड़ने में नहीं, बल्कि खुद पर नियंत्रण रखने में है।'