एक छोटे से गाँव में कवि और माया नाम के दो दोस्त रहते थे। वे एक ही स्कूल में पढ़ते थे। कवि बहुत ही मिलनसार और मेहनती था, लेकिन माया के मन में एक बुराई थी—उसे दूसरों की सफलता देखकर ईर्ष्या होती थी।
एक बार स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। माया ने बहुत मेहनत की थी, लेकिन कवि ने प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता। कवि की जीत देखकर माया को खुशी होने के बजाय जलन महसूस हुई। उसने मन ही मन सोचा, 'यह पुरस्कार मुझे मिलना चाहिए था।'
उस दिन के बाद से माया ने कवि से बात करना कम कर दिया। कवि ने कई बार उससे दोस्ती करने की कोशिश की, लेकिन माया उसे अनदेखा कर देती। इस ईर्ष्या के कारण माया का ध्यान अपनी पढ़ाई और कला से भटक गया। वह हमेशा उदास रहने लगी और उसकी रचनात्मकता भी खत्म होने लगी।
एक दिन उसकी माँ ने उसे समझाया, 'माया, तुम्हें किसी दुश्मन से डरने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे भीतर की यह ईर्ष्या ही तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो तुम्हें धीरे-धीरे अंदर से खत्म कर रही है। दूसरों की खुशी में खुश होना सीखो।'
माया को अपनी गलती का अहसास हुआ। अगली बार जब कवि ने कुछ हासिल किया, तो माया ने सबसे पहले उसे बधाई दी। जैसे ही उसने ईर्ष्या छोड़ी, उसका मन हल्का हो गया और वह फिर से खुश रहने लगी।