एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन हमेशा अच्छाई और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करता था। वह अक्सर कहता, 'ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है' और 'हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।' उसकी इन बातों से गाँव के सभी लोग उसे एक बहुत ही नेक लड़का मानते थे।
एक दिन गाँव के उत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। अर्जुन का दोस्त रोहन अनजाने में एक मिट्टी का बर्तन तोड़ बैठा। अर्जुन ने रोहन के बारे में दूसरों से पीठ पीछे कहा, 'रोहन बहुत चालाक है, उस पर कभी भरोसा मत करना, वह किसी काम का नहीं है।' वह यह सब तब कह रहा था जब रोहन वहाँ मौजूद नहीं था।
पास ही बैठे एक बुजुर्ग, दादाजी ने यह सब सुन लिया। उन्होंने अर्जुन को पास बुलाया और कहा, 'अर्जुन, तुम जो अच्छाई की बातें करते हो, वे सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। लेकिन किसी की पीठ पीछे उसकी बुराई करना तुम्हारे मन की असलियत बताता है। जो व्यक्ति दूसरों के सामने तो धर्म की बात करे, पर पीठ पीछे बुराई करे, उसके मन में सच्चाई नहीं होती।' अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उस दिन के बाद उसने केवल बातों से नहीं, बल्कि अपने अच्छे कामों से नेक बनने का फैसला किया।