एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत ही फुर्तीला था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। वह अक्सर ऐसी बातें करता था जिनका कोई अर्थ नहीं होता था। दोस्तों के साथ खेलते समय या बड़ों से बात करते समय, वह ऐसी बातें बोल देता था जो न तो किसी के काम आती थीं और न ही किसी को खुशी देती थीं, बल्कि कभी-कभी वे दूसरों को दुखी भी कर देती थीं।
एक दिन, अर्जुन अपने दोस्त रोहन के साथ खेल रहा था। रोहन के पास एक नया खिलौना था। उसे देखकर अर्जुन ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, 'यह तो किसी पुराने कबाड़ जैसा लग रहा है!' रोहन का चेहरा उतर गया और वह उदास होकर वहाँ से चला गया।
अर्जुन के दादाजी, माधव ने यह सब देख लिया। शाम को उन्होंने अर्जुन को पास बुलाया और एक खाली बर्तन दिखाते हुए कहा, 'अर्जुन, जब भी तुम कोई ऐसी बात कहते हो जिसका न तो कोई लाभ हो और न ही जिससे किसी को खुशी मिले, तो समझो तुमने इस बर्तन में एक भारी पत्थर डाल दिया है। धीरे-धीरे ये व्यर्थ की बातें तुम्हारे अच्छे चरित्र को भारी और बोझिल बना देंगी।'
अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे याद आया कि कैसे उसके शब्दों ने रोहन को चोट पहुँचाई थी। उसने तय किया कि अब से वह केवल वही बोलेगा जो उपयोगी हो या जिससे दूसरों को खुशी मिले।