एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके पिता रवि रहते थे। रवि एक मेहनती किसान थे। एक शाम, रवि बहुत परेशान थे क्योंकि उनकी बरसों की जमापूंजी वाला थैला कहीं खो गया था। अर्जुन ने डरते हुए पूछा, 'पिताजी, अब हम क्या करेंगे?'
रवि ने शांति से कहा, 'बेटा, पैसा तो आता-जाता रहता है, लेकिन जो हम दूसरों के लिए करते हैं, वही हमारी असली पहचान है।' कुछ दिनों बाद, जब उनके पास खुद के लिए भी बहुत कम अनाज बचा था, रवि ने अपने पड़ोसी, एक वृद्ध महिला, अम्मा की मदद करने का फैसला किया। उन्होंने अम्मा के घर की मरम्मत करने में और उन्हें भोजन देने में मदद की।
अर्जुन को यह समझ नहीं आया। उसने पूछा, 'पिताजी, हम खुद मुश्किल में हैं, फिर हम दूसरों की मदद क्यों कर रहे हैं?' रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, 'जो व्यक्ति समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं समझता और दूसरों की मदद नहीं करता, वह जीवित होकर भी मृत समान है। दूसरों के काम आना ही सच्चा जीवन है।' समय बीतने के साथ, गाँव वालों ने रवि के इस नेक काम को देखा और जब रवि का परिवार संकट में आया, तो पूरे गाँव ने मिलकर उनकी मदद की। अर्जुन समझ गया कि उसके पिता वास्तव में जी रहे थे।