एक सुंदर से गाँव में अरुण नाम के एक बुजुर्ग व्यक्ति रहते थे। वे न केवल बहुत ज्ञानी थे, बल्कि काफी धनवान भी थे। लेकिन अरुण अपना धन केवल तिजोरी में बंद करके रखने के लिए नहीं रखते थे।
एक बार गाँव में भीषण सूखा पड़ा। गाँव का मुख्य तालाब सूखने लगा और लोग बहुत परेशान हो गए। यह देखकर अरुण ने एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने अपने धन से गाँव में नए कुएँ खुदवाने और तालाब की खुदाई करवाने का काम शुरू किया।
उनके एक मित्र, मदन ने उनसे पूछा, "अरुण, तुम अपना इतना सारा सोना इन कुओं में क्यों खर्च कर रहे हो? तुम तो इससे बहुत ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकते हो!"
अरुण मुस्कुराए और बोले, "मदन, जैसे एक बड़ा सरोवर प्यासे लोगों की प्यास बुझाने के लिए हमेशा तैयार रहता है, वैसे ही एक ज्ञानी व्यक्ति का धन भी समाज की सेवा के लिए होना चाहिए। जब मेरा धन दूसरों के दुख दूर करने के काम आता है, तभी वह वास्तव में मेरा धन बनता है।"
अरुण की मदद से तालाब फिर से भर गया और गाँव में खुशहाली लौट आई। अरुण ने महसूस किया कि दान करने से उनका धन कम नहीं हुआ, बल्कि उनका सम्मान उस सरोवर की तरह पूरे गाँव में फैल गया।