एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने माता-पिता के साथ रहता था। उसके पिता एक किसान थे। एक साल गाँव में भीषण सूखा पड़ा और खाने की भारी कमी हो गई। अर्जुन के परिवार को भी बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। एक दिन अर्जुन ने अपने दोस्त रोहन को देखा, जो राहगीरों से खाने के लिए माँग रहा था। रोहन ने कहा, 'अर्जुन, हम भी ऐसा ही क्यों नहीं करते? इससे हमें खाना आसानी से मिल जाएगा।'
अर्जुन को भूख लगी थी, लेकिन उसे अपने पिता की बात याद आई। उसके पिता हमेशा कहते थे, 'बेटा, दूसरों के सामने हाथ फैलाना हमारे आत्मसम्मान को कम करता है। भले ही माँगने से पेट भर जाए, लेकिन देने का सुख और सम्मान कहीं बड़ा है।'
उस शाम, घर में बहुत कम अनाज था, फिर भी अर्जुन की माँ ने उसमें से थोड़ा हिस्सा पड़ोस की एक बूढ़ी दादी को दे दिया। अर्जुन ने देखा कि उस छोटे से दान से उनके चेहरों पर कितनी शांति थी। उसने समझ लिया कि माँगना बुरा है, चाहे वह कितना भी आसान क्यों न लगे, लेकिन देना सबसे बड़ा पुण्य है। समय बदला, सूखा खत्म हुआ और अर्जुन बड़ा होकर एक ऐसा व्यक्ति बना जो हमेशा दूसरों की मदद करता था।