एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। रामू बहुत मेहनती था और उसका एक सपना था—अपने परिवार के लिए एक पक्का घर बनाना। इस सपने को पूरा करने के लिए वह रोज़ाना अपनी कमाई से कुछ पैसे बचाकर एक गुल्लक में रखता था।
एक शाम, जब रामू बाज़ार से लौट रहा था, उसने सड़क किनारे एक बूढ़े व्यक्ति को बैठा देखा। वह व्यक्ति बहुत कमज़ोर लग रहा था और भूख के कारण उसकी आँखें धंसी हुई थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कई दिनों से कुछ खाया न हो।
रामू के पास जो पैसे थे, वे उसके सपनों के घर के लिए जमा किए गए थे। एक पल के लिए वह झिझका। उसने सोचा, 'अगर मैंने ये पैसे खर्च कर दिए, तो मेरा घर कैसे बनेगा?' लेकिन फिर उसने उस वृद्ध की बेबस आँखों को देखा। उसे लगा कि घर तो बाद में भी बन सकता है, लेकिन इस इंसान की जान बचाना ज़रूरी है।
रामू तुरंत पास की दुकान पर गया और उस वृद्ध के लिए गरमा-गरम खाना लेकर आया। खाना खाकर जब उस वृद्ध के चेहरे पर मुस्कान आई, तो रामू को जो सुकून मिला, वह किसी भी धन से बढ़कर था। उसे समझ आ गया कि धन को केवल संचय करना ही काफी नहीं है, बल्कि भूखों को भोजन कराना ही सबसे बड़ा निवेश है।