एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके पिता रवि रहते थे। रवि एक मेहनती किसान थे, लेकिन एक साल भीषण सूखे के कारण उनकी सारी फसल बर्बाद हो गई। उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं बचे। अर्जुन ने अपने पिता का हाथ पकड़कर कहा, "पिताजी, हिम्मत मत हारिए। हम फिर से मेहनत करेंगे और धन कमाएंगे।"
सालों की कड़ी मेहनत के बाद, रवि फिर से एक समृद्ध किसान बन गए। लेकिन उसी गाँव में विक्रम नाम का एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। विक्रम के पास बहुत सोना था, लेकिन उसके दिल में दया की एक बूंद भी नहीं थी। एक दिन, एक भूखा यात्री विक्रम के दरवाजे पर रोटी माँगने आया। विक्रम ने उसे डाँटकर भगा दिया और कहा, "मेरे पास दूसरों को देने के लिए कुछ नहीं है!"
अर्जुन ने यह सब देखा। उसने देखा कि रवि अब अमीर थे, फिर भी वे ज़रूरतमंदों की मदद करते थे। अर्जुन समझ गया कि जिसके पास धन नहीं है, वह मेहनत करके धन कमा सकता है, लेकिन जिसके पास दया नहीं है, वह वास्तव में सबसे बड़ा गरीब है। असली धन पैसा नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा है।