एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। अर्जुन बहुत ही प्यारा बच्चा था, लेकिन उसे खाने के स्वाद का बहुत शौक था। एक दिन गाँव के मेले में, उसके दोस्त ने उसे मांस का एक टुकड़ा दिया। अर्जुन ने उसे चखा और उसे उसका स्वाद बहुत अच्छा लगा। वह बार-बार वही खाना चाहता था।
तभी उसके दादाजी वहाँ आए और उन्होंने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया। दादाजी के हाथ में एक छोटा सा खरगोश था, जो डर से कांप रहा था। दादाजी ने धीरे से कहा, "अर्जुन, इस नन्हे खरगोश की आँखों में देखो। यह भी तुम्हारी तरह ही एक जीवित प्राणी है। यदि हम केवल स्वाद के लिए किसी जीव की जान लेते हैं, तो उस जीव का दर्द हमारे मन पर एक बोझ बनकर हमेशा रह जाएगा। जीवन की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। एक बार जब हम किसी को कष्ट पहुँचाने के रास्ते पर चल पड़ते हैं, तो वहाँ से वापस आना बहुत कठिन होता है।"
अर्जुन ने खरगोश की आँखों में देखा। उसे उसमें जीवन की पुकार सुनाई दी। उस पल अर्जुन का हृदय परिवर्तन हो गया। स्वाद के लिए किसी की जान लेने का विचार उसके मन से निकल गया। उस दिन के बाद से, अर्जुन ने सभी जीवों के प्रति दया भाव रखना शुरू कर दिया। उसने महसूस किया कि दूसरों के जीवन का सम्मान करने से उसे जो शांति मिली, वह किसी भी स्वाद से कहीं बढ़कर थी।