एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके दादाजी सोमनाथ रहते थे। सोमनाथ बहुत ज्ञानी थे। एक दिन, गाँव के एक लालची ज़मींदार ने अर्जुन के परिवार की ज़मीन हड़पने की योजना बनाई। जब अर्जुन को यह पता चला, तो वह गुस्से से भर गया। उसने दादाजी से कहा, 'दादाजी, हमें उसे सबक क्यों नहीं सिखाते? हमें उससे लड़ना चाहिए!'
दादाजी ने शांति से कहा, 'अर्जुन, क्रोध से शत्रु को नहीं जीता जा सकता। तुम अपने चरित्र को मज़बूत बनाओ। अनुशासन और भलाई पर ध्यान दो। तुम्हारी सादगी और सच्चाई ही तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति बनेगी।' अर्जुन थोड़ा उलझन में था, लेकिन उसने दादाजी की बात मान ली। उसने अपना समय दूसरों की मदद करने और मन की शांति पाने में लगाया।
कुछ महीनों बाद, अर्जुन के शांत और अनुशासित स्वभाव की पूरे गाँव में चर्चा होने लगी। लोग उसके परिवार का बहुत सम्मान करने लगे। अर्जुन के नेक दिल और उसके ऊँचे चरित्र को देखकर उस लालची ज़मींदार को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने ज़मीन वापस कर दी। अर्जुन ने कभी उस व्यक्ति से झगड़ा नहीं किया, लेकिन अर्जुन के अच्छे कर्मों ने ही उस व्यक्ति के बुरे विचारों को खत्म कर दिया और परिवार को सम्मान दिलाया।