एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन चाहता था कि सब उसे एक महान योद्धा समझें। एक दिन उसे अपने पिता का एक बड़ा और भारी लबादा (cloak) मिला। उसने उसे अपने कंधों पर डाला, हाथ में एक लकड़ी की छड़ी ली और गाँव के बीचों-बीच जाकर खड़ा हो गया।
'देखो! मैं बहुत बहादुर हूँ!' उसने सीना तानकर कहा। गाँव वाले उसे देखकर हैरान रह गए। अर्जुन को बहुत गर्व महसूस हुआ, लेकिन सच तो यह था कि वह अंदर से बहुत डरपोक था। एक छोटी सी बिल्ली को देखकर भी उसके पसीने छूट जाते थे।
शाम को एक छोटे से पिल्ले ने ज़ोर से भौंकना शुरू किया। अर्जुन ने खुद को बहादुर दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर कांपने लगे। वह भारी लबादा उसके डर को छिपा नहीं सका। तभी उसके दादाजी उसके पास आए और बोले, 'अर्जुन, तुम उस गाय की तरह हो जिसने बाघ की खाल ओढ़ ली है। बाहर से योद्धा दिखने से कोई वीर नहीं बन जाता, वीरता मन के साहस में होती है।'
अर्जुन समझ गया कि दिखावा करने से असली ताकत नहीं आती। उसने तय किया कि वह दिखावा करने के बजाय सच में बहादुर बनेगा।