एक छोटे से गाँव में लियो नाम का एक लड़का रहता था। उसे नई चीज़ें, रंगीन खिलौने और चमकदार चीज़ें इकट्ठा करना बहुत पसंद था। उसे लगता था कि जितनी ज़्यादा चीज़ें उसके पास होंगी, वह उतना ही खुश रहेगा। एक दिन उसके दादाजी, सीलास ने उसे एक छोटी लकड़ी की डिबिया दी और कहा, 'लियो, इसे संभाल कर रखना।'
लियो ने उस डिबिया को एक कोने में रख दिया, लेकिन जल्द ही उसका मन उससे ऊब गया। उसने सोचा, 'यह तो पुरानी है, मुझे कुछ नया चाहिए!' वह रोज़ नए खिलौनों के पीछे भागने लगा। उसके कमरे में बहुत सारा सामान था, लेकिन फिर भी उसे कभी चैन नहीं मिला। उसे हमेशा लगता था कि कुछ कमी है।
एक तूफानी रात में, लियो का सबसे पसंदीदा खिलौना टूट गया। वह बहुत उदास होकर रोने लगा। तब उसके दादाजी ने उसे पास बिठाया और समझाया, 'लियो, जैसे एक पक्षी कुछ देर के लिए पेड़ की टहनी पर बैठता है और फिर अपने असली घोंसले की तलाश में उड़ जाता है, वैसे ही यह शरीर और ये खिलौने भी बस कुछ समय के लिए हैं। ये हमारा असली घर नहीं हैं। असली घर तो हमारे अच्छे कर्म और प्रेम हैं।'
लियो समझ गया कि खिलौनों की खुशी पल भर की होती है, लेकिन दूसरों के प्रति दया और मन की शांति हमेशा साथ रहती है।