एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। अर्जुन को अपने परिवार, अपने हरे-भरे खेतों और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों से बहुत लगाव था। वह अपने काम और दोस्तों के साथ बिताए पलों का भरपूर आनंद लेता था।
लेकिन अर्जुन एक गहरा विचारक भी था। वह जानता था कि यह संसार परिवर्तनशील है। उसे यह भी आभास था कि एक दिन ऐसा आएगा जब उसे अपनी सभी सांसारिक वस्तुओं का त्याग कर शांति की खोज में निकलना होगा।
एक शाम, उसके मित्र विक्रम ने पूछा, 'अर्जुन, तुम हमेशा सब कुछ त्यागने की बात क्यों करते हो? अभी तो हमारे पास इतना कुछ है, इसका आनंद क्यों नहीं लेते?'
अर्जुन मुस्कुराया और बोला, 'विक्रम, मैं अभी इसका आनंद ले रहा हूँ। मुझे अपने घर, अपने काम और हमारी दोस्ती से बहुत प्यार है। जब तक मेरे मन में इन चीजों के प्रति प्रेम है, मैं इन्हें पूरी तरह से जीना चाहता हूँ। लेकिन, जिस दिन मैं शांति की तलाश में सब कुछ छोड़ने का निर्णय लूँगा, उस दिन मुझे पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। यदि संसार का आनंद लेना है, तो वह अभी लेना चाहिए। एक बार त्याग करने के बाद, फिर से संसार की वस्तुओं की इच्छा करना सही नहीं है।'
अर्जुन ने अपने जीवन के सभी कर्तव्यों को बहुत ही खुशी और ईमानदारी से निभाया। जब उसके जीवन में शांति की खोज में निकलने का समय आया, तो वह बिना किसी पछतावे के, एक संतुष्ट मन के साथ आगे बढ़ गया।