एक घने जंगल के पास कवि नाम का एक युवक रहता था। जीवन की सच्चाई और शांति की खोज में उसने जंगल में तपस्या करने का निर्णय लिया। उसके पास केवल एक छोटा सा कपड़ा और एक लकड़ी का कटोरा था। वह बहुत खुश था क्योंकि उसे लगता था कि अभाव में रहने से उसका मन भटकता नहीं है।
कुछ महीने बीत गए। एक दिन एक व्यापारी वहाँ से गुजरा। कवि की शांति देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने कवि को सोने के सिक्कों से भरी एक थैली भेंट की। व्यापारी ने कहा, 'अब तुम्हें कठिनाई नहीं सहनी पड़ेगी, इससे तुम आराम से रह सकते हो।'
सोना मिलते ही कवि के विचारों में बदलाव आने लगा। वह सोचने लगा, 'इस सोने से मैं एक सुंदर घर बना सकता हूँ, अच्छे कपड़े पहन सकता हूँ।' धीरे-धीरे उसकी तपस्या और शांति गायब होने लगी। उसका ध्यान अब ईश्वर या सत्य पर नहीं, बल्कि धन को सुरक्षित रखने और उसे खर्च करने पर था। उसका मन अशांत हो गया।
तब कवि को समझ आया कि सच्ची साधना का अर्थ ही अभाव है। जैसे ही उसके पास संपत्ति आई, उसका संकल्प डगमगा गया। उसने महसूस किया कि वस्तुएँ इंसान को उसके असली लक्ष्य से भटका देती हैं।