एक सुंदर गाँव में सोमू नाम का एक लड़का और उसके पिता रवि रहते थे। रवि एक किसान था और उसके पास बहुत सारी ज़मीन, पशु और धन-दौलत थी। लेकिन रवि हमेशा चिंतित रहता था। वह हमेशा सोचता रहता, 'मुझे एक और गाय चाहिए, मुझे और ज़मीन खरीदनी है।' इस अंतहीन दौड़ के कारण उसे न तो चैन की नींद आती थी और न ही शांति मिलती थी।
उसी गाँव के किनारे एक छोटी सी कुटिया में ज्ञानी नाम के एक साधु रहते थे। उनके पास कुछ भी नहीं था, फिर भी उनके चेहरे पर हमेशा एक अद्भुत चमक और खुशी रहती थी। एक दिन सोमू उनके पास गया और पूछा, "दादाजी, मेरे पिताजी के पास सब कुछ है, फिर भी वे हमेशा परेशान रहते हैं। आपके पास कुछ नहीं है, फिर भी आप इतने खुश कैसे हैं?"
ज्ञानी मुस्कुराए और बोले, "सोमू, तुम्हारे पिता इच्छाओं के जाल में फँसे हुए हैं। जो लोग इस जाल में फँस जाते हैं, वे बस भागते ही रहते हैं और कभी संतुष्ट नहीं होते। मैंने किसी चीज़ को पकड़ने की इच्छा छोड़ दी है, इसलिए मैं आज़ाद हूँ।"
कुछ दिनों बाद, गाँव में एक बड़ा तूफान आया। रवि की फसलें और सामान खराब हो गया। रवि बहुत दुखी होकर बैठा था। तब ज्ञानी उसके पास आए और बोले, "रवि, तुम जो कुछ भी इकट्ठा करते हो, वह एक दिन जा सकता है। लेकिन तुम्हारे मन की शांति को कोई नहीं छीन सकता।" रवि को अपनी गलती समझ आ गई। उसने महसूस किया कि शांति चीज़ों में नहीं, बल्कि मन के संतोष में है। उसने सादगी से जीना शुरू कर दिया और उसे सच्ची शांति मिल गई।