एक छोटे से गाँव में कवि नाम का एक लड़का रहता था। उसे नई चीज़ों, खिलौनों और मिठाइयों का बहुत शौक था। उसे लगता था कि खुशियाँ केवल चीज़ों को इकट्ठा करने में हैं। एक दिन, गाँव के एक बुजुर्ग, दादाजी रामलाल से उसकी मुलाकात हुई।
कवि ने पूछा, 'दादाजी, मैं हमेशा खुश कैसे रह सकता हूँ?'
दादाजी ने एक बुझा हुआ दीया दिखाते हुए कहा, 'बेटा, जैसे धुएँ से भरी जगह में रोशनी नहीं दिखती, वैसे ही हमारी इच्छाएँ और अज्ञानता हमारे मन को धुंधला कर देती हैं। हम चीज़ों के पीछे भागते रहते हैं और फिर उनके खो जाने पर दुखी होते हैं। असली ज्ञान बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने भीतर की सच्चाई को पहचानने में है।'
कवि को पहले तो यह बात समझ नहीं आई। लेकिन कुछ दिनों बाद, जब उसका सबसे प्रिय खिलौना टूट गया, तो वह बहुत रोया। उस दुख के क्षण में उसे दादाजी की बात याद आई। उसे समझ आया कि उसकी उदासी खिलौने के प्रति उसके मोह के कारण थी। धीरे-धीरे, उसने चीज़ों के बजाय शांति और दूसरों की मदद करने में खुशी ढूँढनी शुरू कर दी। जैसे ही उसके मन से लालच का अंधेरा हटा, उसे एक नई मानसिक शांति मिली।