एक छोटे से गाँव में कविन नाम का एक लड़का रहता था। कविन को हर चीज़ पाने की बहुत इच्छा रहती थी। एक दिन उसे एक जादुई घड़ा मिला। घड़े ने कहा, 'तुम जो चाहो मांग लो, मैं तुम्हें दे दूँगा।'
कविन ने सबसे पहले ढेर सारी मिठाइयाँ माँगी। मिठाइयाँ पाकर उसे बहुत खुशी हुई, लेकिन तभी उसके मन में आया कि काश एक चॉकलेट का महल होता! जैसे ही महल मिला, उसे सोने का मुकुट चाहिए होने लगा। कविन की इच्छाएँ खत्म ही नहीं हो रही थीं। वह चाहकर भी चैन से सो नहीं पाता था क्योंकि उसका दिमाग हमेशा अगली चीज़ के बारे में सोचता रहता था।
उसके दादाजी ने उसे समझाया, 'कविन, इच्छा एक बीज की तरह है। जब तुम एक बीज बोते हो, तो वह पेड़ बनता है और वह पेड़ फिर से बहुत सारे बीज पैदा करता है। इच्छा भी ऐसी ही है। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी तुरंत पैदा हो जाती है। यह एक कभी न खत्म होने वाला चक्र है।'
कविन समझ गया कि इच्छाएँ उसे खुशी नहीं, बल्कि बेचैनी दे रही हैं। उसने जो उसके पास था, उसमें संतोष करना सीखा और तभी उसे असली शांति मिली।