एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन के पास बहुत सारे खिलौने थे, लेकिन उसका मन कभी नहीं भरता था। उसे हमेशा अपने दोस्तों के पास मौजूद नए और चमकते खिलौनों की चाहत रहती थी। वह जितना पाता, उसकी इच्छा उतनी ही बढ़ जाती थी।
एक शाम, उसके दादाजी माधव ने उसे अपने पास बिठाया। दादाजी ने उसे एक सुंदर पत्थर दिखाया और कहा, 'अर्जुन, यह पत्थर बहुत सुंदर है। लेकिन अगर तुम हमेशा इससे बड़े या बेहतर पत्थर की चाहत रखोगे, तो तुम इस पत्थर की सुंदरता का आनंद कभी नहीं ले पाओगे। इच्छाएँ तुम्हें कभी चैन से बैठने नहीं देंगी।'
अर्जुन ने सोचा। उसे एहसास हुआ कि जब भी उसे कोई नया खिलौना मिलता, उसकी खुशी बस कुछ ही देर के लिए होती थी और फिर उसे कुछ और चाहिए होता था। वह इस भागदौड़ से थक गया था। 'तो क्या इच्छाओं को छोड़ देना ही असली आजादी है?' अर्जुन ने पूछा।
दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हाँ बेटा, जो अपनी इच्छाओं पर विजय पा लेता है, वही वास्तव में मुक्त है।' उस दिन के बाद, अर्जुन ने जो उसके पास था, उसमें खुश रहना सीख लिया। उसका मन शांत हो गया।