पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी माधव के साथ रहता था। माधव एक बहुत प्रसिद्ध मूर्तिकार थे। अर्जुन स्वभाव से बहुत चंचल था। उसे हमेशा कुछ न कुछ पाने की इच्छा रहती थी—कभी नया खिलौना, कभी ज़्यादा मिठाई, तो कभी पड़ोसी से बेहतर चीज़। इस लालच के कारण वह कभी खुश नहीं रहता था और न ही किसी काम में उसका मन लगता था।
एक दिन अर्जुन ने देखा कि दादाजी एक पत्थर को तराश रहे हैं। अर्जुन ने अधीर होकर पूछा, "दादाजी, आप इतनी धीरे काम क्यों कर रहे हैं? अगर आप जल्दी करेंगे, तो हम और भी बहुत कुछ कर पाएंगे!"
माधव मुस्कुराए और बोले, "बेटा, मेरा मन इस बात पर नहीं है कि मुझे क्या मिलेगा। मेरा पूरा ध्यान सिर्फ इस पत्थर और छेनी पर है। जब इंसान की इच्छाएं कम हो जाती हैं, तभी वह अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाता है।"
कुछ दिनों बाद, एक अमीर व्यापारी ने माधव को बहुत सारा पैसा देने का लालच दिया, लेकिन शर्त यह थी कि उन्हें जल्दी-जल्दी और बिना फिनिशिंग के मूर्तियां बनानी होंगी। माधव ने साफ मना कर दिया। उन्होंने लालच के लिए अपने हुनर से समझौता नहीं किया।
अर्जुन ने यह सब देखा और उसने कुछ नया करने की सोची। उसने लकड़ी के छोटे खिलौने बनाना शुरू किया। वह यह नहीं सोचता था कि उसे कितने पैसे मिलेंगे या लोग उसकी कितनी तारीफ करेंगे। वह बस खिलौना बनाने के आनंद में खो जाता था।
जल्द ही, एक बड़े कलाकार की नज़र अर्जुन के खिलौनों पर पड़ी। वह उनके काम से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अर्जुन को राजदरबार में काम करने का मौका दिलाया। अर्जुन हैरान था! उसने कुछ मांगा नहीं था, लेकिन जब उसने अपनी इच्छाओं को काबू में रखकर काम पर ध्यान दिया, तो सफलता खुद चलकर उसके पास आई।