एक समय की बात है, सोमनाथ नाम का एक बहुत बड़ा व्यापारी था। उसके पास अपार धन, सोना और ज़मीन थी। लेकिन इतनी संपत्ति होने के बावजूद, सोमनाथ और उसका परिवार खुश नहीं था। उसका बेटा अर्जुन हमेशा संपत्ति खोने के डर में रहता था और उसकी पत्नी सुमति हमेशा धन की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती थी।
एक दिन सोमनाथ एक ज्ञानी महात्मा के पास गया और पूछा, 'महाराज, मैंने करोड़ों की संपत्ति जमा की है, फिर भी मेरे परिवार को इससे सुख क्यों नहीं मिल रहा?' महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, 'सोमनाथ, तुमने धन तो इकट्ठा कर लिया, लेकिन उसे भोगने का अधिकार भाग्य तय करता है। मनुष्य चाहे कितना भी धन बटोर ले, वह केवल उतना ही भोग पाता है जितना उसका भाग्य उसे देता है।'
कुछ समय बाद, राज्य में अकाल पड़ा। सोमनाथ ने अपनी संपत्ति का उपयोग गाँव वालों की मदद के लिए किया। जब उसने दूसरों की सेवा की, तो उसने देखा कि उसके बेटे और पत्नी के चेहरों पर डर की जगह शांति और खुशी आ गई है। सोमनाथ समझ गया कि धन केवल जमा करने के लिए नहीं होता, बल्कि भाग्य के विधान के अनुसार उसे सही समय पर सही कार्यों में लगाना ही असली सुख है।