एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान लड़का रहता था। अर्जुन पढ़ाई में तो बहुत तेज़ था, लेकिन उसकी एक आदत थी—जैसे ही उसका काम पूरा होता, वह बिना किसी से बात किए तुरंत वहाँ से भाग जाता। इससे लोग थोड़ा उदास महसूस करते थे।
एक दिन, गाँव के एक बुजुर्ग, राघव जी ने अर्जुन को कुछ नया सिखाने के लिए अपने घर बुलाया। राघव जी बहुत दयालु थे। उन्होंने अर्जुन को स्वादिष्ट फल खिलाए, अच्छी कहानियाँ सुनाईं और उसके सवालों के जवाब दिए। अर्जुन को उनके साथ बहुत अच्छा लगा।
जब जाने का समय आया, तो अर्जुन ने कहा, 'राघव जी, अब मैं चलता हूँ!' वह तेज़ी से मुड़ने ही वाला था कि राघव जी ने प्यार से कहा, 'अर्जुन, एक विद्वान व्यक्ति का काम दो चीज़ें करना है: मिलने पर दूसरों को खुशी देना, और जाते समय उन्हें इस तरह छोड़ना कि वे कहें—काश! हम इनसे दोबारा कब मिलेंगे?'
अर्जुन को यह बात बहुत अच्छी लगी। अगली बार जब वह राघव जी से मिलने गया, तो उसने न केवल पढ़ाई की, बल्कि उनके साथ हँसा-मुस्कुराया और उन्हें सम्मान भी दिया। जब वह विदा लेने लगा, तो राघव जी के चेहरे पर एक मुस्कान थी और वे कह रहे थे, 'अर्जुन, तुम्हारे आने का इंतज़ार रहेगा।' अर्जुन समझ गया कि असली ज्ञान केवल किताबों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को जीतने में है।