एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत ऊर्जावान था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह बिना कुछ जाने ही बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता था। वह चाहता था कि सब उसे बहुत बुद्धिमान समझें।
एक दिन गाँव के बुजुर्ग खेती और पानी की समस्या पर चर्चा कर रहे थे। अर्जुन बीच में कूद पड़ा और चिल्लाकर बोला, 'मुझे सब पता है! अगर फसल नहीं उगी, तो हम बादलों को ज़ोर से चिल्लाकर कहेंगे कि वे बरसें!' वहाँ मौजूद सभी लोग चुप हो गए। अर्जुन की बातों में कोई तर्क नहीं था, बस खालीपन था। उसकी सहेली मीरा ने धीरे से कहा, 'अर्जुन, बिना सोचे-समझे ऐसा बोलना ठीक नहीं है।'
अर्जुन शर्म से लाल हो गया। उस रात उसके दादाजी ने उसे समझाया, 'अर्जुन, क्या तुम बिना खानों (squares) वाले शतरंज के बोर्ड पर खेल सकते हो? नहीं न! वैसे ही, बिना ज्ञान के सभा में बोलना बेकार है।' उस दिन के बाद से, अर्जुन बोलने से पहले सीखने और समझने पर ध्यान देने लगा। अब उसकी बातें सार्थक होती थीं।