एक सुंदर से गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। आर्यन बहुत ऊर्जावान था, लेकिन उसमें एक बुराई थी। उसे लगता था कि उसे सब कुछ पता है, भले ही उसे किसी विषय की जानकारी न हो। जब भी गाँव के बड़े लोग किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते, आर्यन बीच में कूद पड़ता ताकि वह खुद को बुद्धिमान दिखा सके।
एक बार गाँव के बुजुर्ग एक पुराने पुल की मरम्मत के बारे में बात कर रहे थे। इससे पहले कि कोई अपनी बात पूरी करता, आर्यन चिल्लाया, "मुझे सब पता है, मैं बताता हूँ!" लेकिन जब उसने बोलना शुरू किया, तो उसकी बातें बेतुकी और उलझी हुई थीं। उसे पुल की मजबूती या नदी के बहाव के बारे में कुछ नहीं पता था। गाँव के लोग उसे देखकर मुस्कुराने लगे और उसकी बातों का कोई मोल नहीं था। आर्यन को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।
उदास होकर आर्यन एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसके दादाजी उसके पास आए और प्यार से बोले, "आर्यन, बिना ज्ञान के बोलने की इच्छा रखना वैसा ही है जैसे बिना पैरों के दौड़ने की कोशिश करना। इच्छा तो है, पर आधार नहीं है। यदि तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारी बात सुनें, तो पहले तुम्हें सीखना होगा। ज्ञान वह रोशनी है जो तुम्हारी बातों को चमक देती है।"
आर्यन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने पढ़ाई और सीखने पर ध्यान देना शुरू किया। कुछ वर्षों बाद, जब आर्यन गाँव की सभा में बोलता, तो सभी लोग चुपचाप उसे सुनते, क्योंकि अब उसके पास सच्चा ज्ञान था।