चंद्रपुर नामक एक सुंदर राज्य में विक्रम नाम का एक युवा राजा राज करता था। विक्रम बुद्धिमान था, लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर तीन बुराइयाँ पनपने लगीं। पहली, लालच—उसे प्रजा की मदद करने के बजाय अपना खजाना भरने की चिंता रहने लगी। दूसरी, अहंकार—उसे लगने लगा कि वह अपने मुकुट के कारण सबसे श्रेष्ठ है। तीसरी, विलासिता—वह राज्य के कार्यों को छोड़कर महँगी दावतों और फिजूल की खुशियों में खोया रहने लगा।
एक बार राज्य में भीषण सूखा पड़ा। लोग भूख से व्याकुल थे। विक्रम के सलाहकार माधव ने कहा, "महाराज, प्रजा संकट में है, और आप स्वर्ण और उत्सवों में व्यस्त हैं।" \विक्रम ने गर्व से कहा, "मैं राजा हूँ, मैं जो चाहूँ वो कर सकता हूँ!"
उसी रात विक्रम ने एक डरावना सपना देखा। उसने देखा कि उसका सोने का सिंहासन इतना भारी हो गया है कि वह उसे कुचल रहा है, और उसके शानदार भोजन का स्वाद रेत जैसा हो गया है। जब उसकी नींद खुली, तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि लालच, घमंड और व्यर्थ के सुख एक राजा को कैसे कमजोर बना देते हैं।
अगले दिन से विक्रम बदल गया। उसने खजाने का उपयोग जनता की भलाई के लिए किया, अहंकार त्याग कर सलाहकारों की बात मानी और फिजूलखर्ची बंद कर दी। चंद्रपुर फिर से खुशहाल हो गया।