एक सुंदर से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन चित्रकारी करने में बहुत निपुण था, लेकिन उसमें एक बुरी आदत थी। वह अपनी हर पेंटिंग दिखाकर गर्व से कहता, 'देखो, मैं दुनिया का सबसे महान चित्रकार हूँ! मेरे जैसा कोई नहीं!' उसकी इस आदत के कारण दूसरे बच्चे उसके साथ खेलना छोड़ देते थे।
एक बार गाँव में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। अर्जुन को पूरा विश्वास था कि वह जीतेगा। उसने एक बहुत सुंदर दृश्य बनाया, लेकिन प्रतियोगिता का विजेता अर्जुन नहीं, बल्कि मीरा नाम की एक शांत लड़की बनी।
अर्जुन गुस्से में चिल्लाया, 'यह गलत है! मैं ही सबसे अच्छा हूँ, फिर मैं क्यों नहीं जीता?' पास खड़े एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अर्जुन को पास बुलाकर समझाया, 'बेटा अर्जुन, एक सच्चा कलाकार अपनी कला से पहचान बनाता है, अपनी बातों से नहीं। जब तुम खुद की प्रशंसा करते हो, तो तुम अपना समय और ऊर्जा व्यर्थ करते हो। व्यर्थ की बातों में समय गँवाने के बजाय, अपनी कला को और बेहतर बनाने पर ध्यान दो।'
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने उस दिन से खुद की तारीफ करना छोड़ दिया और चुपचाप अपनी कला सुधारने में लग गया। कुछ समय बाद, लोग न केवल उसकी पेंटिंग की, बल्कि उसके अच्छे स्वभाव की भी प्रशंसा करने लगे।