एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक किसान रहता था। उसके पास एक छोटा सा खेत और कुछ गायें थीं। अर्जुन बहुत ही दयालु स्वभाव का था। एक साल गाँव में भीषण सूखा पड़ा। कई परिवार भोजन के लिए तरसने लगे।
उसके मित्र विक्रम ने सुझाव दिया, "अर्जुन, हमें अपना सारा अनाज भूखे लोगों को दे देना चाहिए। तभी हम सच्चे इंसान कहलाएंगे!"
अर्जुन का मन पिघल गया, लेकिन उसने अपने भविष्य के बारे में भी सोचा। उसे पता था कि अगली बुवाई के लिए बीज चाहिए और अपने परिवार का पेट भरने के लिए भी अनाज रखना होगा। उसने सब कुछ दान करने के बजाय, अपनी क्षमता को देखते हुए एक हिस्सा दान किया और बाकी बचा लिया।
गाँव के एक बुजुर्ग ने यह देखा और पूछा, "अर्जुन, तुमने सब कुछ क्यों नहीं दे दिया? क्या तुम स्वार्थी हो रहे हो?"
अर्जुन ने विनम्रता से कहा, "बाबा, अगर मैं आज सब कुछ दे दूँगा, तो कल दूसरों की मदद करने के लिए मेरे पास कुछ नहीं बचेगा। यदि मैं अपनी संपत्ति सुरक्षित रखूँगा, तभी मैं आने वाले वर्षों में भी लोगों की सेवा कर पाऊँगा।"
बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, "तुमने सही किया अर्जुन। अपनी सामर्थ्य को पहचानकर और अपने भविष्य को ध्यान में रखकर दिया गया दान ही सच्चा दान है।"
जब बारिश हुई, तो अर्जुन के पास बीज सुरक्षित थे, जिससे उसने अच्छी फसल ली। इस तरह वह आने वाले समय में गाँव वालों की और भी अधिक मदद कर सका।