एक छोटे से गाँव के मुखिया, रामलाल जी, को गाँव के पुराने कुएँ की मरम्मत करवाने का काम सौंपा गया। रामलाल जी चाहते थे कि यह काम उनके चचेरे भाई का बेटा, सोहन, करे। उन्होंने सोचा, 'सोहन तो मेरा अपना है, वह काम को बहुत अच्छे से निभाएगा।'
लेकिन सोहन को निर्माण कार्य का कोई अनुभव नहीं था। काम शुरू होने के कुछ ही दिनों में, कुएँ की दीवारें टेढ़ी होने लगीं और पानी का रास्ता रुकने लगा। गाँव वाले घबरा गए कि कहीं कुआँ ढह न जाए। तभी गाँव के एक अनुभवी मिस्त्री, दीनदयाल जी, वहाँ आए। उन्होंने देखा कि काम में बहुत लापरवाही बरती जा रही है।
रामलाल जी पहले तो हिचकिचाए क्योंकि वे सोहन से बहुत लगाव रखते थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि कुआँ गिरने से गाँव वालों को खतरा हो सकता है, तो उन्होंने सोहन को हटाकर दीनदयाल जी को काम सौंप दिया। दीनदयाल जी ने अपनी बुद्धिमानी और धैर्य से कुएँ को बहुत ही मजबूती से ठीक कर दिया। रामलाल जी समझ गए कि किसी भी महत्वपूर्ण काम को केवल लगाव के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की योग्यता और धैर्य के आधार पर ही सौंपना चाहिए।