एक सुंदर घाटी में अर्जुन नाम का एक किसान रहता था। उसके पास बहुत सारे खेत और पशु थे। वह संपन्न था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक डर रहता था कि क्या उसके रिश्तेदार उसे उसके धन के कारण पसंद करते हैं या वास्तव में उससे प्रेम करते हैं।
एक साल उस इलाके में भीषण सूखा पड़ा। बारिश नहीं हुई और फसलें सूख गईं। अर्जुन की जमा पूँजी धीरे-धीरे खत्म होने लगी। उसे डर लगने लगा कि कहीं वह सब कुछ न खो दे। वह बहुत अकेला और निराश महसूस करने लगा।
तभी उसके भाई रवि और उसके अन्य रिश्तेदार उसके पास आए। वे उससे मदद माँगने नहीं, बल्कि उसकी मदद करने आए थे। रवि ने उसका हाथ थामकर कहा, 'अर्जुन, तुम अकेले नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं।'
रिश्तेदारों ने मिलकर काम किया। किसी ने अनाज दिया, तो किसी ने कुआँ खोदने में मदद की। उनके इस निस्वार्थ प्रेम और साथ ने अर्जुन को हार मानने नहीं दी। सबकी मेहनत से खेत फिर से लहलहा उठे और अर्जुन पहले से भी अधिक समृद्ध हो गया। अर्जुन समझ गया कि असली धन सोना-चाँदी नहीं, बल्कि अपनों का अटूट प्रेम है।