एक छोटे से गाँव में कदिर नाम का एक लड़का रहता था। गाँव के किनारे एक पुराना और उजाड़ बगीचा था। गाँव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, 'किस्मत में नहीं है, तो यह बगीचा कभी नहीं खिलेगा।' इसलिए किसी ने भी वहाँ कुछ करने की कोशिश नहीं की।
लेकिन कदिर का मन उस बगीचे में लगा रहता था। एक दिन उसने एक छोटा सा बीज लिया और सूखी मिट्टी को खोदना शुरू किया। उसका दोस्त मारन उसे देखकर हँसा, 'कदिर, क्यों बेकार में अपनी मेहनत बर्बाद कर रहे हो? किस्मत ने तय कर दिया है कि यह बगीचा कभी नहीं फलेगा।'
कदिर ने मुस्कुराते हुए कहा, 'मारन, मुझे नहीं पता कि किस्मत क्या कहती है, लेकिन मुझे पता है कि मेहनत करने से मेरे मन को शांति मिलती है।'
कदिर रोज़ सुबह जल्दी उठता और दूर की नदी से पानी भरकर लाता और बगीचे में डालता। धूप हो या बारिश, वह थकता नहीं था। हफ़्तों बीत गए, पर कुछ नहीं हुआ। लोग उसका मज़ाक उड़ाने लगे। पर कदिर ने हार नहीं मानी।
एक सुबह, जब वह मिट्टी साफ कर रहा था, उसने देखा कि एक छोटा सा हरा अंकुर मिट्टी से बाहर निकल रहा है! कदिर की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसकी मेहनत रंग लाई थी। कुछ ही महीनों में, वह उजाड़ बगीचा रंग-बिरंगे फूलों से भर गया। जो लोग कहते थे कि यह असंभव है, वे भी कदिर की मेहनत देखकर दंग रह गए।