एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। रामू बहुत मेहनती था और उसकी फसल हमेशा अच्छी होती थी। गाँव के अन्य लोग जब अधिक धन कमाते, तो उसे दिखावे और फिजूलखर्ची में उड़ा देते थे। लेकिन रामू अलग था; वह अपनी जरूरतों को सीमित रखता और भविष्य के लिए अनाज और धन बचाकर रखता था।
एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। बारिश न होने के कारण फसलें बर्बाद हो गईं। गाँव के लोग डर गए और रोने लगे, 'अब हमारा क्या होगा? हमारे पास तो कुछ नहीं बचा!'
रामू के पड़ोसी श्याम ने उससे पूछा, 'रामू, क्या तुम्हें डर नहीं लगता? अगर तुम्हारी जमा पूँजी भी खत्म हो गई, तो तुम भी हमारे जैसे गरीब हो जाओगे!'
रामू ने शांति से उत्तर दिया, 'श्याम, जब मेरे पास बहुत कुछ था, तब मैंने लालच नहीं किया। मैंने अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखा और बचत की। इसीलिए, आज भले ही बुरा वक्त आया है, लेकिन मैं कभी यह नहीं कहूँगा कि मैं दरिद्र हूँ। मेरी बचत ही मेरी ताकत है।'
सूखे के उन कठिन महीनों में रामू की बचत ने उसके परिवार का पेट भरा। जहाँ दूसरे लोग हताश थे, वहीं रामू शांत और आत्मविश्वासी बना रहा।