पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में अर्जुन अपने दादाजी के साथ रहता था। एक दिन जंगल में घूमते समय अर्जुन का पैर एक नुकीले पत्थर से टकरा गया और उसके पैर में गहरी चोट लग गई। दर्द से कराहते हुए अर्जुन रोने लगा, 'दादाजी, बहुत दर्द हो रहा है! मुझे लगता है कि मैं अब कभी ठीक से चल नहीं पाऊँगा।'
उसके दादाजी ने उसे बहुत प्यार से समझाया, 'अर्जुन, यह शरीर एक औज़ार की तरह है। काम करते समय इसमें चोट लग सकती है या दर्द हो सकता है। लेकिन अगर तुम शरीर के इस दर्द को अपनी कमजोरी बना लोगे, तो तुम जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे। महान लोग शरीर की तकलीफ को बाधा नहीं मानते।'
दादाजी की बात अर्जुन के दिल को छू गई। दर्द होने के बावजूद उसने धीरे-धीरे चलने का अभ्यास किया। कुछ ही हफ्तों में वह फिर से दौड़ने-खेलने लगा। उसने समझ लिया कि शरीर को कष्ट हो सकता है, लेकिन मन को कभी हार नहीं माननी चाहिए।