एक सुंदर से गाँव में कविन नाम का एक बुद्धिमान लड़का रहता था। कविन बहुत चतुर था, लेकिन उसकी एक आदत थी; वह बिना सोचे-समझे, यह देखे बिना कि वह किससे बात कर रहा है, तुरंत सब कुछ बोल देता था।
एक दिन, कविन के पिता, जो गाँव के एक सम्मानित सलाहकार थे, को गाँव के बुजुर्गों को एक महत्वपूर्ण संदेश देना था। कविन ने मदद करने की इच्छा से कहा, 'पिताजी, मैं यह संदेश दे दूँगा!'
उस शाम, गाँव की एक सभा हुई। कविन संदेश देने के लिए आगे आया। लेकिन वहाँ मौजूद लोग गाँव के ज्ञानी और अनुभवी बुजुर्ग थे। कविन बहुत तेज़ी से और बहुत ही अनौपचारिक शब्दों में बोलने लगा। इससे बुजुर्ग उलझन में पड़ गए और कुछ को तो यह अपमानजनक भी लगा।
बाद में कविन के पिता ने उसे प्यार से समझाया, 'कविन, तुम्हारी बात सही थी, लेकिन तुमने यह नहीं देखा कि तुम किससे बात कर रहे हो। तुम अपने दोस्तों से जिस तरह बात करते हो, वैसे बुजुर्गों से नहीं कर सकते। तुम्हें उनकी समझ और स्थिति का सम्मान करते हुए बोलना चाहिए।'
अगले दिन, कविन को फिर से एक सूचना देने का मौका मिला। इस बार, उसने पहले वहाँ बैठे लोगों को देखा। वे शांत थे। कविन ने बहुत धीरे, सम्मानजनक शब्दों में और स्पष्ट रूप से बात की। इस बार सभी ने उसकी बात को ध्यान से सुना और सही ढंग से समझा।
कविन ने सीखा कि असली बुद्धिमानी केवल जानकारी रखने में नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से सही लोगों तक पहुँचाने में है।