एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसे चित्रकारी करने का बहुत शौक था। एक बार गाँव में एक बड़ी चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसका पुरस्कार एक सोने की ट्रॉफी थी।
अर्जुन का दोस्त रोहन उसकी मदद करना चाहता था। रोहन ने कहा, 'अर्जुन, तुम चिंता मत करो। मेरे पिताजी के पास सबसे महंगे रंग और ब्रश हैं, मैं वे तुम्हें दे दूँगा। उनसे तुम बहुत सुंदर चित्र बना सकोगे।' अर्जुन बहुत खुश हुआ। उसने उन महंगे रंगों का उपयोग करके एक चमकता हुआ चित्र बनाया। लेकिन उसके मन में एक डर था, 'अगर ये रंग न हों, तो क्या मैं कभी अच्छा चित्र बना पाऊँगा?'
वहीं दूसरी ओर, मीरा नाम की एक लड़की थी, जिसके पास कोई महँगा सामान नहीं था। उसके पास केवल रसोई की लकड़ी का कोयला और कुछ टहनियाँ थीं। मीरा ने हार मानने के बजाय, रोज़ अभ्यास करना शुरू किया। उसने कोयले से छाया और रोशनी बनाना सीखा। उसने अपनी मेहनत और लगन से अपनी कला को निखारा।
प्रतियोगिता के दिन, रोहन के दिए रंगों से बना चित्र बहुत चमकदार था। लेकिन मीरा के कोयले से बने चित्र में एक अद्भुत जान थी; वह चित्र भावनाओं से भरा हुआ था। जजों ने मीरा के चित्र को विजेता चुना।
रोहन हैरान था। उसने पूछा, 'पर मेरे पास तो इतने अच्छे साधन थे, फिर मीरा क्यों जीती?' शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, 'रोहन, अच्छे साधन केवल सुविधा और चमक दे सकते हैं। लेकिन मीरा के निरंतर प्रयास और उसके काम की कुशलता ने उसे वह सब कुछ दिया जो एक कलाकार को चाहिए।' अर्जुन समझ गया कि केवल साधनों से नहीं, बल्कि अपने काम की निपुणता से ही असली सफलता मिलती है।