एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसे किताबें पढ़ना बहुत पसंद था। लेकिन उसके मन में एक छोटा सा डर था। जब भी स्कूल में शिक्षक कोई सवाल पूछते, तो अर्जुन को उत्तर पता होने के बावजूद वह चुप रहता था। उसे डर लगता था कि कहीं दूसरे बच्चे उसका मज़ाक न उड़ाएँ।
एक दिन गाँव में एक बड़ी समस्या आ गई। गाँव का तालाब सूख रहा था। पानी के संकट को दूर करने के लिए गाँव के सभी लोग एक सभा में इकट्ठा हुए। अर्जुन भीड़ के एक कोने में खड़ा होकर सब सुन रहा था।
गाँव के एक बुजुर्ग ने पूछा, 'हम इस पानी का बँटवारा कैसे करें?' सब लोग उलझन में थे। अर्जुन को अपनी पढ़ी हुई किताबों से एक बहुत अच्छा उपाय याद आया। लेकिन वह डर गया, 'अगर मैंने कुछ कहा, तो क्या सब मुझ पर हँसेंगे?'
अर्जुन के दादाजी, विक्रम, ने उसकी घबराहट देख ली। उन्होंने अर्जुन के कान में धीरे से कहा, 'बेटा, जिस व्यक्ति में वीरता नहीं, उसके हाथ में तलवार का क्या काम? ठीक उसी तरह, जिस व्यक्ति के पास ज्ञान है लेकिन वह सभा में बोलने से डरता है, उस ज्ञान का क्या फायदा? असली विद्वान वही है जो सही समय पर अपनी बात कहने का साहस रखे।'
दादाजी की बात सुनकर अर्जुन के अंदर साहस जागा। वह धीरे से आगे आया। शुरू में उसकी आवाज़ थोड़ी कांपी, लेकिन फिर वह आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहने लगा। उसका सुझाव इतना अच्छा था कि सभी ग्रामीणों ने उसकी सराहना की। उस दिन अर्जुन ने सीखा कि ज्ञान केवल किताबों में नहीं होता, बल्कि उसे निडर होकर सबके सामने रखने में होता है।