सुंदरपुर नाम का एक बहुत ही सुंदर राज्य था। वहाँ का राजकुमार अर्जुन अपने विशाल किले पर बहुत गर्व करता था। किले में अनाज के बड़े भंडार, पानी के कुएँ और बहुत सारे हथियार थे। अर्जुन कहता था, 'मेरे पास सब कुछ है, हमें किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है।'
लेकिन एक बार राज्य पर संकट के बादल छा गए। पड़ोसी राज्य के सैनिकों ने हमला करने की योजना बनाई। अर्जुन घबरा गया। उसने अपने मंत्री से पूछा, 'हमारे पास सब कुछ तो है, फिर मुझे डर क्यों लग रहा है?'
मंत्री ने मुस्कुराते हुए कहा, 'राजकुमार, किला केवल दीवारों और सामान से नहीं बनता। भोजन, पानी और हथियार होना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी वे बहादुर और बुद्धिमान लोग हैं जो संकट के समय इन चीज़ों का सही इस्तेमाल करके किले की रक्षा कर सकें।'
जब हमला हुआ, तो किले के अनाज ने सैनिकों को शक्ति दी और हथियारों ने बचाव किया। लेकिन, असली जीत तब हुई जब सैनिकों ने अपनी बहादुरी और ग्रामीणों ने अपनी चतुराई से दुश्मनों को मात दी। अर्जुन समझ गया कि केवल सामान होने से सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि उन सामानों का सही उपयोग करने वाले वीर योद्धाओं के होने से ही किला अभेद्य बनता है।
उस दिन के बाद, अर्जुन ने केवल किले की दीवारें ऊँची करने पर नहीं, बल्कि अपने लोगों को कुशल बनाने पर ध्यान दिया।