एक सुंदर गाँव में अर्जुन नाम का एक मेहनती किसान रहता था। उसके पास बस एक छोटा सा खेत और एक बैलगाड़ी थी। उसी गाँव में विक्रम नाम का एक बहुत अमीर आदमी रहता था। विक्रम को बहुत घमंड था और वह अक्सर अर्जुन की गरीबी का मज़ाक उड़ाता था। वह कहता, 'अर्जुन, तुम्हारे पास क्या है? क्या तुमने एक मुट्ठी अनाज भी बचाकर रखा है?'
अर्जुन उसकी बातों से दुखी नहीं होता था। वह बस अपने काम में लगा रहता। वह हर दिन अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा बचाकर रखता था। साल बीतते गए और अर्जुन की छोटी सी बचत धीरे-धीरे बड़ी हो गई। उसने उस पैसे से अच्छे बीज, नए औज़ार और ज़्यादा ज़मीन खरीदी। उसकी खेती बहुत अच्छी होने लगी।
एक बार गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। विक्रम ने अपना सारा धन ऐशो-आराम में उड़ा दिया था, इसलिए सूखे के समय उसके पास खेती बचाने के लिए कुछ नहीं बचा। उसका सारा घमंड टूट गया और वह बेबस हो गया। लेकिन अर्जुन ने अपनी जमा पूँजी से कुआँ खुदवाया और अपनी फसल बचा ली। अर्जुन की तरक्की देखकर विक्रम को अपनी गलती का अहसास हुआ। अर्जुन की बचत ने एक तेज़ तलवार की तरह विक्रम के अहंकार को काट दिया था।