एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। अर्जुन बहुत ही चंचल था, लेकिन उसे शिष्टाचार और सफाई का महत्व नहीं पता था। एक दिन, गाँव के विद्वान और बड़े-बुजुर्ग एक महत्वपूर्ण चर्चा के लिए सभा भवन में एकत्र हुए। सभा बहुत ही पवित्र और स्वच्छ थी। विद्वान लोग सफेद और साफ बिस्तरों पर बैठकर गंभीर चर्चा कर रहे थे।
अर्जुन के पिता भी उन्हीं विद्वानों में से एक थे। अर्जुन बाहर मिट्टी में खेल रहा था। खेल खत्म करने के बाद, बिना पैर धोए ही वह दौड़ता हुआ सभा में आ गया और एक साफ बिछौने पर बैठ गया। उसके मिट्टी भरे पैरों ने उस पवित्र बिछौने को गंदा कर दिया। सभा में बैठे विद्वानों का ध्यान भटक गया और माहौल की गंभीरता कम हो गई।
अर्जुन के पिता ने उसे प्यार से समझाया, "अर्जुन, जैसे एक साफ बिछौने पर गंदे पैर रखना बहुत गलत है, वैसे ही विद्वानों की सभा में एक अज्ञानी या अनुशासनहीन व्यक्ति का होना उस सभा की गरिमा को कम कर देता है। हमें उस स्थान और वहां मौजूद लोगों के सम्मान के योग्य बनना चाहिए।"
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि किसी भी सभा का हिस्सा बनने के लिए केवल वहां उपस्थित होना काफी नहीं है, बल्कि वहां के सम्मान के योग्य होना भी जरूरी है।