एक शांत गाँव में सैमुअल नाम का एक किसान रहता था। सैमुअल बहुत ही दयालु था, लेकिन वह हिसाब-किताब और चतुराई में थोड़ा कच्चा था। एक दिन, उसे अपनी मेहनत से कमाया हुआ एक सोने का सिक्का मिला। वह बहुत खुश था।
तभी एक थका हुआ यात्री उसके पास आया और बोला, 'भाई, मैं बहुत भूखा हूँ, क्या तुम मेरी कुछ मदद कर सकते हो?' सैमुअल ने बिना सोचे-समझे वह सोने का सिक्का उस यात्री को दे दिया और मुस्कुराते हुए कहा, 'इसे रख लीजिए और भरपेट भोजन कीजिए।'
सैमुअल का मित्र थॉमस यह देखकर हैरान रह गया। उसने डाँटते हुए कहा, 'सैमुअल, तुम कितने मूर्ख हो! वह सिक्का तुम्हारे लिए कितना कीमती था, क्या तुम्हें पता नहीं?' सैमुअल ने शांति से उत्तर दिया, 'थॉमस, मैं शायद बुद्धिमान नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि इस व्यक्ति को यह मदद इसलिए मिल रही है क्योंकि इसके पिछले जन्मों के अच्छे कर्म फल देने का समय आ गया है।'
कुछ समय बाद, सैमुअल के खेत में चमत्कार हुआ। उसकी फसलें पहले से कहीं अधिक लहलहाने लगीं। सैमुअल समझ गया कि उसका वह दान व्यर्थ नहीं गया था। उसने जान लिया कि जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के खुशी-खुशी देता है, तो वह वास्तव में प्राप्त करने वाले के संचित पुण्य का ही फल होता है।