एक सुंदर से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह बिना सोचे-समझे कुछ भी कर डालता था। एक दिन उसके दोस्त रवि ने उसे चेतावनी दी, 'कन्नन, उस बड़े गड्ढे के पास मत जाना, वहाँ बहुत पत्थर हैं और वह खतरनाक है।' लेकिन कन्नन हँसते हुए बोला, 'तुम डरपोक हो, मुझे कुछ नहीं होगा!' और वह रवि की बात अनसुनी कर वहाँ दौड़ने लगा।
तेज़ी से दौड़ते समय कन्नन का ध्यान गड्ढे पर नहीं गया और उसका पैर फिसल गया। वह सीधे गड्ढे में जा गिरा और उसके पैर में गहरी चोट लग गई। रवि दौड़कर आया और उसने कन्नन को बाहर निकाला। दर्द से कराहते हुए कन्नन को देखकर रवि ने शांति से कहा, 'कन्नन, तुम्हें चोट पहुँचाने के लिए कोई दुश्मन नहीं आया है, बल्कि तुमने खुद अपनी नासमझी से यह चोट खुद को दी है।' कन्नन को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने समझ लिया कि बुद्धिमानों की सलाह न मानना खुद के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय है।