एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन उसे एक बुरी आदत थी—गुस्से में वह लोगों को बहुत कड़वी बातें कहता था। एक दिन, गाँव के बुजुर्ग और सलाहकार, श्री राघव, खेती के एक नए तरीके के बारे में बता रहे थे। अर्जुन को वह तरीका पसंद नहीं आया। अपनी असहमति जताने के बजाय, उसने सबके सामने श्री राघव की बुद्धिमानी का मज़ाक उड़ाते हुए बहुत ही अपमानजनक शब्द कहे।
पूरा गाँव सन्न रह गया। श्री राघव गुस्सा नहीं हुए, बल्कि उन्होंने बहुत शांति से कहा, 'अर्जुन, यदि तुम्हारा किसी योद्धा से झगड़ा हो जाए, तो शरीर पर चोट लग सकती है। लेकिन यदि तुम अपनी बातों से किसी विद्वान को अपना शत्रु बना लो, तो वह तुम्हारी प्रतिष्ठा को जीवनभर के लिए नष्ट कर देगा।'
अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि तलवार का घाव तो भर जाता है, लेकिन शब्दों से दिया गया अपमान इंसान के चरित्र को हमेशा के लिए दागदार कर देता है। उस दिन के बाद, अर्जुन ने हमेशा सोच-समझकर बोलना सीखा।