एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसके पिता एक किसान थे। एक दिन बगीचे में टहलते समय, अर्जुन के पिता ने एक छोटा सा काँटेदार पौधा देखा। वह बहुत कोमल था।
"अर्जुन, इस पौधे को अभी उखाड़ देते हैं, जब यह छोटा है," पिता ने सुझाव दिया। अर्जुन हँसते हुए बोला, "पिताजी, यह तो बहुत छोटा है! इससे क्या डरना? हम इसे बाद में देख लेंगे।"
पिता ने गंभीरता से कहा, "बुरी आदतें और बुरे दोस्त इस पौधे की तरह होते हैं। जब वे छोटे होते हैं, तभी उन्हें निकाल देना चाहिए। वरना वे बड़े होकर नुकसान पहुँचाते हैं।"
अर्जुन ने उनकी बात अनसुनी कर दी। दिन बीतते गए और वह छोटा पौधा अब एक बड़ी और घनी काँटेदार झाड़ी बन गया था। एक दोपहर, बगीचे में दौड़ते समय अर्जुन का पैर फिसल गया और वह सीधे उस झाड़ी में जा गिरा। एक बड़े काँटे ने उसके हाथ में गहरा घाव कर दिया। अर्जुन दर्द से रोने लगा।
पिता दौड़कर आए और उसे संभाला। घाव साफ करते हुए उन्होंने प्यार से कहा, "देखा अर्जुन? अगर हमने इसे छोटा होने पर ही हटा दिया होता, तो आज तुम्हें यह दर्द नहीं होता।"
अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि जैसे इस काँटे को हटाया जाना चाहिए था, वैसे ही बुरी संगति और बुरे विचारों को भी शुरुआत में ही छोड़ देना चाहिए।