एक सुंदर गाँव में मारन नाम का एक लड़का रहता था। मारन बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह बड़ों का मज़ाक उड़ाता था। उसी गाँव में वेन्द्र दादा रहते थे, जो बहुत ही शांत और दयालु स्वभाव के थे। वे गाँव के हर व्यक्ति की मदद करते थे।
एक दिन, मारन ने वेन्द्र दादा को धीरे-धीरे चलते देखा और ज़ोर से हँसते हुए कहा, 'दादाजी, आप इतने धीरे क्यों चलते हैं? क्या आप कछुए हैं?' मारन के दोस्त भी हँसने लगे। वेन्द्र दादा बस मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।
धीरे-धीरे मारन की बदतमीज़ी बढ़ती गई। एक दिन जब वेन्द्र दादा भारी सामान उठा रहे थे, मारन ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा, 'देखो, बड़े आदमी भी एक बोझा नहीं उठा पा रहे!' यह सुनकर दादाजी को बहुत दुख हुआ।
उसी शाम, खेलते समय मारन का पैर फिसल गया और उसे गहरी चोट लग गई। वह दर्द से कराह रहा था। तभी वेन्द्र दादा वहाँ आए और बिना कुछ सोचे मारन को सहारा देकर अस्पताल ले गए। मारन को बहुत शर्म महसूस हुई। उसने रोते हुए पूछा, 'दादाजी, मैंने आपके साथ इतना बुरा व्यवहार किया, फिर भी आप मेरी मदद क्यों कर रहे हैं?'
वेन्द्र दादा ने प्यार से समझाया, 'मारन, जो लोग कमज़ोर होकर ताकतवर लोगों को ठेस पहुँचाते हैं, वे असल में अपने विनाश को ही बुलाते हैं। हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।' उस दिन के बाद मारन ने कभी किसी का अनादर नहीं किया।